Monday, 23 April 2012

सोचा जो चीज नहीं निकला ,


सोचा जो चीज नहीं निकला ,
अंकुर पनपा दिल टूट गया !
बोया जो बीज वही   निकला ,
मन कुढ़ पटका सिर -भूल गया !!

बड़े बनें -कुछ रौंद सींच ,
कुछ रोयें हँसे क्या राह सुझाई 
बड़ें रहें कुछ मौन नीच -
मुँह खोले कहें -क्या मात भुलाई !!

जग हँसे ना सो पाला पोषा 
उर्वरक नहीं- जल दे- पल भी कैसा ! 
मन कहे ना जो खाया धोखा ,
उर-परख नहीं -फल दे यह भी कैसा !!

पढना लिखना क्या करना इसे
कपडे भी बस तन ढांक सके !
करना, पिसना,घर रहना इसे ,
लड़ के जीवन क्षण पार करे !!

पहले दें -दूजे भाई को
क्या जिस्म नहीं ना मन मेरे !
जल ना दें -सूखे-आई क्यों ,
क्या किस्म नहीं था मन मेरे !!

सुख पाया न -फिर भी सूखे
दे ना  -दे -ले जा काट इसे !
मुस्काया ना फिर भी रूखे
वो काटें  -ये - क्या मार हमें !!

देता जो इसको खाद सभी 
चल जाती खुद -कमर नहीं टूटे 
देता जो इसको प्यार कभी
बँटवाती दुःख-भरम यही फूटे !!

भ्रमर कहें क्या लाभ मिले ,
रोते -धोते अब खटके मन !
सुख पायें कहें -क्या पाप किये
बोलें -डोलें- अब  भटकें वन !!

मन मीत मिला -सुख पाया सभी 
अब हार भी -हार-माँ बाप है रोती !!

जग छीन लिया , गुण पाया यही 
अब हार ही हार माँ बाप है रोती !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५ 
३.६.२०११
१.३.१९९४ हजारीबाग मंगलवार 

2 comments:

  1. प्रिय मित्रों हमारे इस नए चिट्ठे कविता में भी आप का हार्दिक स्वागत है अपना स्नेह यहाँ भी बरसायें -भ्रमर ५

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